बुधवार, 18 अक्तूबर 2017

आइये आज रूप चतुर्दशी या छोटी दीपावली या नरक चतुर्दशी का यह त्योहार मनाते हैं अपने पाँच रचनाकारों के साथ। आज का यह पर्व धर्मेंद्र कुमार सिंह, गुरप्रीत सिंह, नकुल गौतम, राकेश खंडेलवाल जी और डॉ. संजय दानी के नाम।

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मित्रों दीपावली का त्योहार हमारी वर्ष भर की थकान को दूर करने का एक अवसर होता है। थकान दूर कर आने वाले समय की लिये कुछ और ऊर्जा को एकत्र करने का समय। और इस अवसर का लाभ उठाने में चूकना नहीं चाहिए। असल में हम सब जीवन की जिन परेशानियों और कठिनाइयों से जूझ रहे होते हैं उनके कारण हमारे लिए बहुत आवश्यक होता है कि हम अपने आप को इन पर्वों के बहाने कुछ ताज़ा कर लें। हमारे अंदर जो जीवन शक्ति है वो भी समय समय पर अपने आपको कुछ रीचार्ज करना चाहती है। रोज़ाना के रूटीन से हट कर अपने लिए अपनों के लिए कुछ समय यदि हम निकाल लें तो हमारे लिए जीवन कुछ आसान हो जाएगा। तो मित्रों बस यह कि आनंद मनाइये और आनंद बिखेरिये।

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आइये आज रूप चतुर्दशी या छोटी दीपावली या नरक चतुर्दशी का यह त्योहार मनाते हैं अपने पाँच रचनाकारों के साथ। आज का यह पर्व धर्मेंद्र कुमार सिंह, गुरप्रीत सिंह, नकुल गौतम, राकेश खंडेलवाल जी और डॉ. संजय दानी के नाम।

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धर्मेन्द्र कुमार सिंह

बात ही बात में सादगी खिल उठी
एक बिन्दी लगा साँवली खिल उठी

गुदगुदी कर छुपीं धान की बालियाँ
खेत हँसने लगे भारती खिल उठी

यूँ तो दुबली हुई जा रही थी मगर
डोर मज़बूत पा चरखड़ी खिल उठी

बल्ब लाखों जले, खिन्न फिर भी महल
एक दीपक जला झोपड़ी खिल उठी

एक नटखट दुपट्टा मचलने लगा
उसको बाँहों में भर अलगनी खिल उठी

जब किसानों पे लिखने लगा मैं ग़ज़ल
मुस्कुराया कलम डायरी खिल उठी

उसने पूजा की थाली में क्या धर दिया
कुमकुमे हँस दिये रोशनी खिल उठी

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धर्मेंद्र की ग़ज़लों का मैं शुरू से प्रशंसक रहा हूँ। लेकिन इस बार की ग़ज़ल बिल्कुल अलग ही मूड में है, रचनाकार का यह रंग एकदम चौंकाने वाला है। एक ही बात में सादगी खिल उठी एक बिन्दी लगा साँवली खिल उठी वाह क्या मतला है। धान की बालियों के गुदगुदी करने से भारत की आत्मा का खिल उठना, कमाल है, यह बड़ा शेर हो गया है शायर की सोच के कारण। इस सोच को सलाम। और महल का खिन्न होना तथा एक ही दीपक जलने से झोपड़ी का खिल उठना, उस्तादों की राह पर कहा गया शेर है, कबीर और रहीम के कई दोहे इसी सोच पर कहे गए हैं। और नटखट दुपट्टे को बाँहों में भर कर अलगनी का खिल उठना, वाह यह तो कमाल पर कमाल है, बहुत ही बारीक शेर है। किसानों पर ग़ज़ल लिखते शायर की डायरी और उसका कलम हँसने लगे तो समझिये लेखन सार्थक हो गया। और अंत में गिरह का शेर बिल्कुल ही अलग सोच का शेर है। मिसरा उला ही ऐसा है कि बस। ये जो अनडिफाइंड “क्या” होता है, यह रचना में ग़ज़ब सुंदरता लाता है, कैफ़ भोपाली साहब ख़ूब उपयोग करते थे इसका। बहुत ही सुंदर और बहुत सलीक़े से कही गई ग़ज़ल। वाह वाह क्या बात है।

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Gurpreet singh

गुरप्रीत सिंह

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कुमकुमे हँस दिए, रौशनी खिल उठी
ऐसे हर घर में दीपावली खिल उठी

धूप हर दिन मिली, तो कली खिल उठी
आप मिलने लगे, ज़िन्दगी खिल उठी

खेलते बालकों की हँसी खिल उठी
मानो सारी की सारी गली खिल उठी

आप के पांव घर में मेरे क्या पड़े
छत महकने लगी, देहरी खिल उठी

पहले मंज़र में थी बस ख़िज़ाँ ही ख़िज़ाँ
ये नज़र आप से जो मिली, खिल उठी

सब से छुप के निकाली जो फ़ोटो तेरी
मेरे कमरे में तो चाँदनी खिल उठी

दर्द-ए-दिल आपने जो दिया, शुक्रिया
कहते हैं सब, मेरी शायरी खिल उठी

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मतले में ही गिरह का शेर इस युवा शायर ने ख़ूब लगाया है, दीपावली की सारी भावनाओं को पूरी तरह व्यक्त करता हुआ। मतले के बाद दो हुस्ने मतला भी शायर ने कहे हैं। तीनों अलग अलग रंगों के हैं। धूप हर दिन मिली में प्रेम को बहुत सलीक़े से अभिव्यक्त किया है, किसी के मिलने से ज़िन्दगी का खिल उठना, यह ही तो जीवन है। प्रेम की धूप का प्रयोग बिल्कुल नया है, अभी तक प्रेम की चाँदनी होती थी। खेलते बालकों की हँसी से खिली हुई गली का मतला देर तक उदास कर गया, हाथ पकड़ कर एकदम बचपन में ले गया। बहुत ही सुंदर हुस्ने मतला। किसी के पाँव घर में पड़ते ही छत का महकना और देहरी का खिल उठना यही तो प्रेम होता है। पहले मंज़र में थी बस ख़िजाँ ही ख़िजाँ में मिसरा सानी में उस्तादों की तरह क़ाफिया लगाया है, बहुत ही सुंदर। किसी के फोटो को निकालते ही कमरे में चाँदनी का खिल उठनाबहुत ही सुंदर। और अंत में किसी के दर्दे दिल देने पर शुक्रिया कहना क्योंकि उससे शायर की शायरी खिला उठी है। बहुत ही सुंदर बात कही है, सचमुच प्रेम के बिना कोई भी रचनाकार रचनाकार हो ही नहीं सकता। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल, वाह वाह वाह।

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Nakul Gautam

नकुल गौतम

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वक़्त बस का हुआ तो घड़ी खिल उठी
रास्ते खिल उठे, हर गली खिल उठी

गाँव पहुँचा तो बस से उतर कर लगा
जैसे ताज़ा हवा में नमी खिल उठी

वो हवेली जो मायूस थी साल भर
एक दिन के लिए ही सही, खिल उठी

घर पहुँचते ही छत ने पुकारा मुझे
कुछ पतंगे उड़ीं, चरखड़ी खिल उठी

छत पे नीली चुनर सूखती देखकर
उस पहाड़ी पे बहती नदी खिल उठी

बर्फ़ के पहले फाहे ने बोसा लिया
ठण्ड से काँपती तलहटी खिल उठी

चीड़ के जंगलों से गुज़रती हवा
गुनगुनाई और इक सिंफ़नी खिल उठी

उन पहाड़ी जड़ी बूटियों की महक
साँस में घुल गयी, ज़िन्दगी खिल उठी

मुझ से मिलकर बहुत खुश हुईं क्यारियाँ
ब्रायोफाइलम, चमेली, लिली खिल उठी

थोड़ा माज़ी की गुल्लक को टेढ़ा किया
एक लम्हा गिरा, डायरी खिल उठी

शाम से ही मोहल्ला चमकने लगा
"कुमकुमे हँस दिये, रौशनी खिल उठी"

गांव से लौटकर कैमरा था उदास
रील धुलवाई तो ग्रीनरी खिल उठी

फिर मुकम्मिल हुई इक पुरानी ग़ज़ल
काफ़िये खिल उठे, मौसिकी खिल उठी

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नकुल की कहन इस ग़ज़ल में बिल्कुल अलग अंदाज़ में सामने आई है। सबसे पहले तो मतले में ही जो कमाल किया है वो ग़ज़ब है, सचमुच प्रेम में और इंतज़ार में जो अकुलाहट होती है और उसके बाद जो मिलन की ठंडक होती है वह अलग ही आनंद देती है। वह हवेली जो मायूस थी साल भर शेर ने एक बार फिर से उदास कर दिया, घर में बच्चे आए हुए हैं मेरे भी, और मुझे पता है कि दीपावली के दो दिन बाद सबको जाना है। बहुत ही सुंदर बात कह दी है।और नीली चुनर को सूखती देखकर पहाड़ी नदी का खिल उठना, वाह क्या कमाल का अंदाज़ है इस शेर में, जिओ। बर्फ़ के पहले फाहे का बोसा, ग़ज़्ज़्ज़ब टाइप की बात कह दी है। चीड़ के जंगलों से गुज़रती हवा की बजती हुई सिम्फनी बहुत ही कमाल, यह आब्ज़र्वेशन ही होता है जो रचनाकार को अपने समकालीनों से कुछ आगे ले जाता है। प्रकृति की गंध से भरे अगले दोनों शेरों में जड़ी बूटियों से लेकर चमेली लिली तक सब कुछ महक राह है। और माज़ी की गुल्लक को टेढ़ा करने पर लम्हे का डायरी पर गिरना बहुत ही कमाल की बात कह दी है। गाँव लौटकर कैमरे की रील का धुलवाना और ग्रीनरी का खिल उठना, बहुत ही सुंदर क्या बात है, बहुत ही कमाल की ग़ज़ल। बहुत सुंदर वाह वाह वाह। (इस ग़ज़ल ने पलकों की कोरें नम कर दीं, क्यों ? ये बात ब्लॉग परिवार के वरिष्ठ सदस्य जानते हैं।)

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राकेश  खंडेलवाल जी

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आ गया ज्योति का पर्व यह सामने
सज रही हर तरफ दीप की मालिका
हर्ष उल्लास में डूबी हर इक डगर
घर की अंगनाई महकी, बनी वाटिका
ढोल तासे पटाखों के बजने लगे
नाचने लग पड़ी हाथ में फुलझड़ी
रक्त –‘पंकज’  निवासिन के सत्कार में
बिछ रही है पलक बन,  सजी ‘पाँखुरी’

और ‘रेखा’ हथेली से बाहर निकल
अल्पनाओं में दहलीज की ढल हँसी
सांझ का रूप सजता हुआ देखकर
कुमकुमे हँस दिये रोशनी खिल उठा

बारिशों में नहा मग्न मन शहर के
घर ने खिड़की झरोखों ने कपड़े बदल
चौखटों पर मुंडेरों पे दीपक रखे
फिर हवा से कहा अब चले, तो संभल
सज गए हैं सराफे, कसेरे सभी
झूमती मस्तियों में भरी बस्तियां
स्वर्ण आभूषणों से अलंकृत हुई
धन की औ धान की और गृह लक्ष्मियाँ

अड़ गए टेसू चौरास्तो पर अकड़
साँझियां खिलखिला घूँघटों में हंसी
झूमकर प्रीत के ऐसे अनुराग में
कुमकुमे हंस दिए रोशनी खिल उठी

‘पाँखुरी’ ‘नीरजों’ की लगाती ‘तिलक’
एक ‘सौरभ’ हवा में उड़ाते हुए
आज ‘पारुल’ के पाटल ‘सुलभ’ हो गए
आंजुरी में भरे मुस्कुराते हुए
स्वाति नक्षत्र में आई दीपावली
हर्षमय हो गए ‘अश्विनी’, फाल्गुनी
‘द्विज’ ‘दिगंबर’ दिशाओं को गुंजित करें
और छेड़ें ‘नकुल’ शंख से रागिनी

द्वार ‘शिवना’ के आकर ‘तिवारी’ कहें
आज सबके लिए शुभ हो दीपावली
मन के उदगार ऐसे सुने तो सहज
कुमकुमे हंस दिए रोशनी खिल उठी

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राकेश जी जब भी कुछ करते हैं तो बस कमाल ही करते हैं, इस बार भी उन्होंने मेरे दोनों परिवारों को अपने गीत में समेट लिया है। गीत का पहला ही छंद मानों दीपावली के उल्लास में डूब कर रचा गया है। ऐसा लगता है जैसे छंद में से गंध, स्वर, नाद सब कुछ फूट रहा है। बहुत ही कमाल। सांझ का रूप सजता हुआ देखकर, कुमकुमे हँस दिये रोशनी खिल उठा, वाह क्या बात है। बारिशों से नहा चुके शहर का कपड़े बदलना और फिर उसके हवा से यह कहना कि अब ज़रा संभल कर चले, वाह वाह वाह, क्या ही सुंदर चित्र बना दिया है। साँझियां खिलखिला घूँघटों में हंसी, यह एक पंक्ति जैसे गीतों के स्वर्ण युग में वापस ले जाती है, मन में कहीं गहरे तक उतर जाती है। और उसके बाद के बंद में ब्लॉग परिवार के सदस्यों का प्रतीक रूप में ज़िक्र आना मानों सोने पर सुहागे के समान है। यह ही कला है जो राकेश जी को बहुत आगे का कवि बना देती है। अंतिम पंक्तियों में शिवना का ज़िक्र आ जाना कुछ भावुक भी कर गया। राकेश जी इस ब्लॉग के आधार स्तंभ क्यों हैं, यह बात आज की यह रचना पढ़कर ही ज्ञात हो जाता है। बहुत ही सुंदर गीत, क्या बात है, वाह वाह वाह।

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डॉ. संजय दानी

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कुककुमे हंस दिये रौशनी खिल उठी
एक चिलमन उठी, तो गली खिल उठी

इश्क़ का जादू सर मेरे जबसे चढा
दिल के आकाश की दिल्लगी खिल उठी

जब छिपा चांद बादल में तो दोस्तों
सोच कर जाने क्या चांदनी खिल उठी

जो घिरी थी उदासी के दामन में कल
तुम नहा आये तो वो नदी खिल उठी

शायरी में मेरी तुमने तन्क़ीद की
तो बुझी सी मेरी शायरी खिल उठी

देख खुश जूतियों को तेरी जाने मन
बुद्धी के चेहरे पर बेकसी खिल उठी

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मतले में ही किसी चिलमन के उठते ही सारी गली का खिल उठना और साथ में कुमकुमों का हँसना, रोशनी का खिल उठना, जैसे पूरा का पूरा दृश्य ही इस एक शेर से बन रहा है। सच में यही तो होता है कि किसी एक चेहरे पर पड़ा नकाब, किसी एक चिलमन के हटते ही ऐसा लगता है मानों पूरा आसपास का परिदृश्य ही बदल गया है। किसी एक का जादू यही तो होता है। चाँद का बादलों में छिप जाना और किनारों से झरती हुई चाँदनी का खिल उठना प्रकृति के बहाने वस्ल का दृश्य रचने का एक सुंदर प्रयास है। और अगले ही शेर में किसी के नहा आने पर नदी का खिल उठना यही तो वो बात है जिसके लिए कहा जाता है कि जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि। किसी के नहा लेने भर से नदी के खिल उठने की कल्पना केवल कवि ही कर सकता है। नहीं तो सोचिए कि बदलता क्या है कुछ भी नहीं, नदी तो वैसे ही बह रही है जैसे कल बह रही थी, लेकिन जो कुछ बदलता है वह नज़रिया होता है।नज़रिया ही तो प्रेम है और क्या है इसके अलावा। किसी एक द्वारा तन्कीद कर देने से शायरी का खिल उठना बहुत ही अच्छा है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल क्या बात है, वाह वाह वाह।

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मित्रों आज तो पाँचों रचनाकारों ने मिल कर दीपावली का रंग ही जमा दिया है। बहुत ही कमाल की ग़ज़लें कही हैं पाँचों रचनाकारों ने। आज रूप की चतुर्दशी पर ऐसी सुंदर रूपवान ग़ज़लें मिल जाएँ तो और क्या चाहिए भला। तो दाद दीजिए खुलकर और खिलकर। मिलते हैं अगले अंक में।

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मंगलवार, 17 अक्तूबर 2017

आइये आज धनतेरस के दिन प्रारंभ करते हैं दीपावली का तरही मुशायरा। आज सुनते हैं तीन रचनाकारों राकेश खंडेलवाल जी, अश्विनी रमेश जी और बासुदेव अग्रवाल 'नमन' जी से उनकी रचनाएँ।

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मित्रो समय का कुछ पता नहीं चलता कि वो कब कैसे बीत जाता है। हम ठगे से रह जाते हैं कि अरे ! अभी तो कल की ही बात थी और साल भर बीत भी गया। असल में हर बीतता हुआ साल हमारे ही बीतने का संकेत होता है। संकेत होता है कि गति के पंखों पर सवार होकर हम बीतते जा रहे हैं। बस एक बात जो हमें हर पल जीवन में बनाए रखती है वो यह होती है कि हम भले ही बीत रहे हों, लेकिन हमें रीतना नहीं चाहिए। बीतना तो हम सबकी नियति है, लेकिन रीतना तो हमारे हाथ में होता है। जो रीतेगा नहीं, वही रचेगा। और एक बात कि जिस चीज़ को हमेशा इस बीतने और रीतने के क्रम में बचाए रखना चाहिए वो होता है हमारा स्वाभिमान। कभी भी किसी भी हालत में अपने स्वाभिमान के साथ समझौता नहीं करना चाहिए। हमारे अंदर का स्वाभिमान ही हमारी पूँजी होता है, वह कभी इतना नहीं बढ़े कि हम अभिमान के ख़तरनाक क्षेत्र में प्रवेश कर जाएँ। और विनम्र होने के चक्कर में इतना न घटे कि हम कायरता के मरुथल में पहुँच जाएँ। आज धन तेरस के दिन आप सबको यही शुभकामनाएँ कि आप सब अपने स्वाभिमान रूपी धन को बचा कर रखें। आप अपनी रचना प्रक्रिया के द्वारा अपने आपको रीतने से बचाते रहें। शुभ हो यह दीपों का पर्व।

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कुमकुमे हंस दिए ,रोशनी खिल उठी

आइये आज धनतेरस के दिन प्रारंभ करते हैं दीपावली का तरही मुशायरा। आज सुनते हैं तीन रचनाकारों राकेश खंडेलवाल जी, अश्विनी रमेश जी और बासुदेव अग्रवाल 'नमन' जी से उनकी रचनाएँ। मैं जानता हूँ कि अब इस ब्लॉग को दस साल हो चुके हैं और आप सब अपने जीवन में व्यस्त हो गए हैं, लेकिन पता नहीं क्यों यहाँ यह तरही का सिलसिला बंद करने की इच्छा नहीं होती, ऐसा लगता है कि एक चौपाल है, जिस पर दीपक जलते रहना चाहिए।

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राकेश खंडेलवाल जी

बादलो के कहारों के कांधे चढ़ी
जा चुकी पालकी दूर बरसात की
चांदनी से धुली गंध को ओढ़कर
कांति बढ़ती हुई चंदनी गात की
मखमली मलयजे झूमती नाचती
ओस से पांव रख द्वार पर आ रुकी
देख कर ऋतु की ऐसी सजीली छटा
कुमकुमे हंस दिए रोशनी खिल उठी

चल पड़ी गुनगुनाते हुए इक किरण
छोड़ प्राचीर अरुणाचली भोर की
सज गई अल्पनाओं से हर इक डगर
बाँसुरी की बजी गूँज झकझोरती
दोपहर रेशमी पाग पहने हुए
साँझ को भेजती एक पाती रही
डाकिया दिन उतरते का आगे बढा
कुमकमे हंस दिए रोशनी खिल उठी

द्वार पर लटकी कंदील ने मुस्कुरा
पास अपने सितारे निमंत्रित किये
स्वस्ति चिह्नों ने उच्चार कर मंत्र तब
पल थे जितने सभी कर असीमित दिए
हर्ष उल्लास की बदलियां, हर दिशा
से उमड़ घेरने तन को मन को लगी
मौसमो का तकाजा था, मावस सजी
कुमकुमे हंस दिए रोशनी खिल उठी

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राकेश जी इस ब्लॉग पर तरही के चलते रहने को लेकर सबसे बड़े प्रेरक हैं, इस बार भी उन्होंने तीन-तीन रचनाएँ भेजी हैं जो आपको आगे के अंकों में पढ़ने को मिलेंगी। आज का गंध और उजास से भरा यह गीत तो मानों दीपावली के त्योहार को आज ही देहरी पर लाकर खड़ा कर रहा है। विदा ले चुकी बरसात के साथ प्रारंभ होता यह गीत मौसम की सारी आहटें समेटे हुए है। बादल, चाँदनी, ओस, मलयज सब मिलाकर जैसे मौसम का एक पूरी चित्र है। जो कुछ हमारे सामने से गुज़र रहा है, बीत रहा है उस सब को पहले ही छंद में सुंदर शब्दों के साथ पिरोया है।  अगले छंद में प्राची से उजाले का संदेश लेकर चली किरण के स्वागत में बनी अल्पनाएँ तथा बाँसुरी तो कमाल है। और अंतिम छंद में दीपावली का पूरा दृश्य सामने आ जाता है। कंदील ने मुस्कुरा कर सितारों को आमंत्रण भेजा और स्व​स्ति चिह्नों ने स्वयं मंत्र उच्चारे हों तो हर दिशा में हर्ष और उल्लास घुलना तो स्वभाविक सी बात है। सजी हुई मावस के सुंदर दृश्यों से सजा एक सुंदर गीत। वाह वाह वाह।

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अश्विनी रमेश जी

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कुमकुमे हंस दिए ,रोशनी खिल उठी
दीप जब जल उठे हर ख़ुशी खिल उठी

लो फ़िज़ा रोशनी की यहां छा गयी
रात दुल्हन बनी बन कली खिल उठी

दीप चारों तरफ झिलमिला अब रहे
है खुशी मन में यूं फुलझड़ी खिल उठी

अबके दीपावली खुशनुमा यों मने
हो खुशी यूं लगे ज़िन्दगी खिल  उठी

नफरतों का अँधेरा मिटा जब तो फिर
हर तरफ प्रेम की बस हँसी खिल उठी

चाहे कविता रची या रची फिर ग़ज़ल
दिल ने पाया सुकूँ शायरी खिल उठी

प्यार का वो उजाला चहूँ ओर हो
रोशनी यूं हुई ज़िन्दगी खिल उठी

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अश्विनी जी की ग़ज़ल भी सबसे पहले प्राप्त होने वाली ग़ज़लों में होती है हर तरही मुशायरे में। उनकी ग़ज़लों में निरंतर विकास का एक क्रम दिखाई देता है। इस बार भी उनकी ग़ज़ल दीपावली के सारे रंग समेटे हुए है। मतले में ही गिरह के मिसरे के साथ अच्छे से तरही मिसरे को गूँथा गया है। यह पूरी ग़ज़ल दीपावली के अलग-अलग रंगों को अपने में समेटे हुए आगे बढ़ती है। जब दीप चारों ओर झिलमिला रहें हों तो खुशी भी मन में फुलझ़डी की ही तरह खिल उठती है। बहुत ही सुंदर प्रयोग। दीपावली को इस प्रकार खुशनुमा मनाने की बात कि जिंदगी के खिल उठने पर जाकर समाप्त हो, तभी तो दीपावली है। बहुत उम्दा बात कही है। नफरतों का अँधेरा जब मिट जाता है तो उसके बाद जो बचता है वह प्रेम होता है और प्रेम की हँसी होती है। बहुत ही सुंदर बात कही है। सही बात है कि जब भी कोई रचनाकार अपनी रचना को रचता है तो उसे एक प्रकार का सुकून मिलता है, इस सुकून का कोई मोल नहीं होता है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल, क्या बात है वाह वाह वाह ।

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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'

जगमगाते दियों से मही खिल उठी,
शह्र हो गाँव हो हर गली खिल उठी।

लायी खुशियाँ ये दीपावली झोली भर,
आज चेह्रों पे सब के हँसी खिल उठी।

आप देखो जिधर नव उमंगें उधर,
हर महल खिल उठा झोंपड़ी खिल उठी।

सुर्खियाँ सब के गालों पे ऐसी लगे,
कुमकुमे हँस दिये रोशनी खिल उठी।

दीप उत्सव पे ग़ज़लें सभी की 'नमन'
ब्लॉग में दीप की ज्योत सी खिल उठी।

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जगमगाते दीपकों से पूरी पृथ्वी को जैसे शायर ने अंतरिक्ष में बैठ कर देखा है। और वहाँ से नज़र आ रहा है कि शहर, गाँव, गली सब जगह प्रकाश  ही प्रकाश है। सब कुछ खिला हुआ सा है। बहुत ही सुंदर मतला। दीपावली का पर्व क्रिसमस के सांता क्लाज की तरह होता है जब आता है तो सबकी झोलियाँ भर देता है सबके चेहरों पर खुशियाँ खिल उठती हैं। और जिस तरफ भी नज़र जाती है उस तरफ सब कुछ खिला हुआ दिखाई देता है। महल से लेकर झोंपड़ी तक सब कुछ खिला खिला सा हो जाता है। जब दीपावली का त्योहार आता है तो उल्लास के कारण सबके गालों पर ऐसा ही प्रतीत होता है जैसे दीपकों के हँसने से रोशनी खिल उठी हो। बहुत ही सुंदर बात कही है। और अंत में मकते का शेर हमारे इस ब्लॉग को और यहाँ पर पिछले दस वर्षों से चल रहे इस सिलसिले को अच्छी तरह से अभिव्यक्ति दे रहा है। सभी सदस्यों को शुभकामनाओं की सुंदर थाली लिए भावनाओं का मंगल तिलक कर रहा है यह मकता। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल क्या बात है। वाह वाह वाह।

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तो मित्रो यह है आज का शुभारंभ। तीनों रचनाकारों की ग़ज़लों का आप आनंद लीजिए और दाद देने में कहीं कोई कंजूसी मत कीजिए। मिलते हैं अगले अंक में।

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सोमवार, 25 सितंबर 2017

दीपावली आ गई है और काम पर लगने का समय आ गया है, तो आइये दीपावली के अवसर पर आयोजित होने वाले तरही मुशायरे के मिसरे की बात करें।

मित्रों एक वर्ष बीत गया और दीपावली का त्योहार एक बार फिर से आ गया है। इस बीच इस ब्लॉग ने भी अपनी स्थापना के दस वर्ष पूरे कर लिए। वर्ष 2007 में इस ब्लॉग की शुरूआत हुई थी माह अगस्त के अंति सप्ताह में, इस प्रकार ये दस वर्ष हँसते खेलते बीत गए। आई पी एल से उधार लेते हुए कहता हूँ – ये दस साल आपके नाम। बीतना समय की प्रकृति है और वह बीतता ही है। पीछे छोड़ जाता है कई सारी खट्टी मीठी यादें। इस बीच कई रिश्ते बने, कई लोग मिले जिनसे मिलकर ऐसा लगा कि जन्मों जन्मों का संबंध है। एक परिवार जैसा बन गया। इस परिवार ने मिलकर सारे त्योहार मनाए। फिर ये भी हुआ कि कुछ लोग दूर हो गए। कुछ को ईश्वर ने अपने पास बुलाकर हमसे दूर कर दिया तो कुछ मन से दूर हो गए। जो दूर हो गए वे भी हमारे ही हैं। असल में सच कभी भी निरपेक्ष सच नहीं होता, वह हमेशा सापेक्ष सच होता है। हर व्यक्ति का अपना सापेक्ष सत्य होता है। इसलिए ज़रूरी नहीं होता कि जो किसी एक का सापेक्ष सच है वो दूसरे का भी हो। कोई भी सत्य पूर्ण या अंतिम सत्य नहीं होता, उसे सापेक्ष होना ही होता है। दुनिया में सापेक्ष सत्यों की ही लड़ाई है। हम सब अपने-अपने सापेक्ष सचों को अंतिम मान कर उसी को दूसरों से भी मनवाने की कोशिश में लगे रहते हैं। और नतीज़ा यह होता है कि रिश्तों में कड़वाहट आ जाती है।

आइये आज बात करते हैं दीपावली के त्योहार की। दीपावली का त्योहार एक बार फिर से आ गया है और एक बार फिर से हम सब सब कुछ भूल कर कुछ दिनों के लिए उत्सव की मस्ती में डूबने को तैयार हो चुके हैँ। दस सालों से इस मस्ती का एक और ठिकाना भी होता है और वो होता है इस ब्लॉग पर आयोजित होने वाला यह तरही मुशायरा। सब लोग जिस उमंग से जिस उत्साह से इसमें भाग लेते हैं उसीके कारण यह मुशायरा हर वर्ष यादगार हो जाता है।

कुमकुमे हँस दिए, रोशनी खिल उठी

इस बार बहर वही ली जा रही है जो होली पर भी ली गई थी। असल में जब दीपावली की तरही का विचार आया तो सबसे पहले जो मिसरा दिमाग़ में बना वो यही था। इसके बाद बहुत सोच विचार किया कि कुछ और कर लिया जाए लेकिन बहरे मुतदारिक मुसमन सालिम के अलावा कोई और ठौर नहीं दिखा। तो फाएलुन फाएलुन फाएलुन फाएलुन पर ही इस बार का तरही मुशायरा करने का तय कर लिया। रोशनी में जो ई की मात्रा है वो हमारे काफिये की ध्वनि होगी मतलब ज़िंदगी, शायरी, रोशनी आदि आदि। और खिल उठी रदीफ होगा।

तो यह है दीपावली का होमवर्क अभी काफी दिन हैं तो उठाइये काग़ज़ कलम और तैयार हो जाइए। मिलते हैं दीपावली के मुशायरे में।

सोमवार, 24 जुलाई 2017

शिवना साहित्यिकी का जुलाई-सितम्बर 2017 अंक

मित्रों, संरक्षक तथा सलाहकार संपादक सुधा ओम ढींगरा Sudha Om Dhingra प्रबंध संपादक नीरज गोस्वामी Neeraj Goswamy , संपादक पंकज सुबीर, कार्यकारी संपादक- शहरयार Shaharyar तथा सह संपादक पारुल सिंह Parul Singh के संपादन में शिवना साहित्यिकी का जुलाई-सितम्बर 2017 अंक अब ऑनलाइन उपलब्धl है। इस अंक में शामिल है संपादकीय, शहरयार Shaharyar । व्यंग्य चित्र -काजल कुमार Kajal Kumar । आवरण कविता - शमशेर बहादुर सिंह, आवरण चित्र के बारे में....- विस्मय / पल्लवी त्रिवेदी Pallavi Trivedi , उपन्यास अंश- पागलखाना / डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी Gyan Chaturvedi , संस्मरण आख्यान- होता है शबोरोज़ तमाशा मिरे आगे, सुशील सिद्धार्थ Sushil Siddharth , कथा-एकाग्र- नीलाक्षी फुकन Nilakshi Phukan कहानी विखंडन Ajay Navaria , अनीता सक्सेना Anita Saxena कहानी Mehrunnisa Parvez , पुस्तक चर्चा- हँसी की चीखें / कांता राय Kanta Roy Santosh Supekar , एक वह कोना / गोविंद भारद्वाज Govind Bhardwaj Govind Sharma , पहाड़ पर धूप / यादवेंद्र शर्मा Murari Sharma , फिल्म समीक्षा के बहाने- हिन्दी मीडियम, माम, वीरेन्द्र जैन Virendra Jain , बातें-मुलाक़ातें- कृष्णा अग्निहोत्री Krishna Agnihotri , ज्योति जैन Jyoti Jain , रंगमंच- आर्यभट्ट और नाटक ‘अन्वेषक’, प्रज्ञा Pragya Rohini , पेपर से पर्दे तक- कृष्णकांत पंड्या Krishna Kant Pandya, पुस्तक-आलोचन- यादों के गलियारे से / कैलाश मण्डलेकर Kailash Mandlekar , समीक्षा, वंदना गुप्ता Vandana Gupta Maitreyi Pushpa / वो सफ़र था कि मुकाम था, शिखा वार्ष्णेय Shikha Varshney Aruna Sabharwal / उडारी, डॉ. ज्योति गोगिया @jyoti gogiya Sudha Om Dhingra / धूप से रूठी चाँदनी, योगिता यादव Yogita Yadav Shashi Padha / लौट आया मधुमास, शरद सिंह Sharad Singh@manohar agnani / अंदर का स्कूल, तरही मुशायरा Digamber Naswa Nusrat Mehdi @mahesh khalish Saurabh Pandey Nirmal Sidhu Girish Pankaj Tilak Raj Kapoor @sudhir tyagi @vasudeo agrwal Rakesh Khandelwal , आवरण चित्र- पल्लवी त्रिवेदी Pallavi trivedi photography photography - डिज़ायनिंग-सनी गोस्वामी Sunny Goswami । आपकी प्रतिक्रियाओं का संपादक मंडल को इंतज़ार रहेगा। पत्रिका का प्रिंट संस्करण भी समय पर आपके हाथों में होगा।
ऑन लाइन पढ़ें-

https://www.slideshare.net/shivnaprakashan/shivna-sahityiki-july-september-2017
https://issuu.com/shivnaprakashan/docs/shivna_sahityiki_july_september_201

मंगलवार, 4 जुलाई 2017

आइये आज हम ईद के मुशायरे का समापन करते हैं चार रचनाकारों के साथ शेख चिल्ली जी, बासुदेव अग्रवाल 'नमन' जी, महेश चन्द्र गुप्त ’ख़लिश’ जी और राकेश खंडेलवाल जी की रचनाओं के साथ हम ईद की दुआओं में विश्व शांति की कामना करते हैं।

मित्रों चूँकि त्यौहार के बाद उसके मनाए जाने की एक सीमा होती है। और उसके बाद हमें अपने अपने कार्यों पर लौटना ही होता है। इसीलिए आज हम ईद के मुशायरे का समापन कर रहे हैं। हालांकि अपेक्षाकृत रूप से कम ग़ज़लें आईं इस बार लेकिन उसके पीछे मेरे विचार में बहर का मुश्किल होना और रदीफ काफिये के कॉमिब्नेशन का भी कुछ उलझन भरा होना एक कारण है। लेकिन एक बात तो है कि जो ग़ज़लें आईं वो बहुत अच्छी आईं। बहुत ही अच्छे प्रयोग शायरों ने किये। और एक अच्छी बात ये भी हुई है कि ईद मुबारक को लेकर सबके पास अच्छी ग़ज़लें भी हो गईं हैं। ईद के मुबारक मौके पर यदि आपको किसी मुशायरे में शिरकत करने जाना हो तो ये खूबसूरत ग़ज़ल आपके काम आएगी।

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आइये आज हम ईद के मुशायरे का समापन करते हैं चार रचनाकारों के साथ शेख चिल्ली जी, बासुदेव अग्रवाल 'नमन' जी, महेश चन्द्र गुप्त ’ख़लिश’ जी और राकेश खंडेलवाल जी की रचनाओं के साथ हम ईद की दुआओं में विश्व शांति की कामना करते हैं।

कहती है ये खुशियों की सहर ईद मुबारक

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शेख़ चिल्ली

सावन की झड़ी लायी ख़बर ईद मुबारक़
हो काश दुआओं में असर, ईद मुबारक

सलफास निगल कर भी वो बोला, मेरे बच्चों
रखना मेरे खेतों पे नज़र, ईद मुबारक़

मायूस खड़े काकभगोड़े ने बताया
कह कर था गया मुझ से बशर "ईद मुबारक़"

सुनकर ये टपकती हुई छत फूट के रोई,
चलता हूँ मैं लम्बा है सफ़र, ईद मुबारक़

क्रिसमस न, दीवाली न तो होली न गुरुपर्व
मज़दूर की किस्मत में किधर ईद मुबारक़

सरकार की नीयत पे लगे दाग धुलेंगे
हो जाय किसानों की अगर ईद मुबारक़

बक़वास है, सौ फ़ीसदी झूटी ये ख़बर है
कहती है ये ख़ुशियों की सहर, ईद मुबारक?

मतले में सकारात्मक नोट के साथ शुरू होकर पूरी ग़ज़ल व्यथा की कहानी कहती हुई एक लगभग मुसलसल ग़ज़ल है। जिसमें किसान और मजदूर की कहानी को आँसुओं से लिखा गया है। पहला ही शेर कलेजे को चीर कर उतर गया। मेरे जिले में पिछले पन्द्रह दिनों में बीस के लगभग किसान आत्म हत्या कर चुके हैं। और मिसरा सानी जैसा हूबहू एक वाकया हुआ भी है। एक किसान ने सल्फास खाकर अपने बच्चों से यही कहा था। उफ़्फ। और उसके बाद काकभगोड़े का दृश्य भी उसी कहानी को आगे बढ़ाता है। घर की टूटी हुई छत अपने मालिक को लम्बे सफ़र पर जाते हुए देख कर रो रही है बहुत ही मार्मिक दृश्य बन पड़ा है। अकाल में उत्सव लिखने वाले लेखक के लिए यह दृश्य कैसा होगा आप समझ सकते हैं। और यह भी सच है कि मजदूर के किस्मत में कोई त्यौहार नहीं होता। आखिरी शेर में जिस अंदाज़ में गिरह लगाई है वो अंदाज़ सबसे हट के है। सच में जो सबसे हट कर करे वो ही तो देर तक याद रहता है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल वाह वाह वाह।

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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'

रमजान गया आई नज़र ईद मुबारक,
खुशियों का ये दे सबको असर ईद मुबारक।

घुल आज फ़िज़ा में हैं गये रंग नये से,
कहती है ये खुशियों की सहर ईद मुबारक।

पाँवों से ले सर तक है धवल आज नज़ारा,
दे कर के दुआ कहता है हर ईद मुबारक।

सब भेद भुला ईद गले लग के मनायें,
ये पर्व रहे जग में अमर ईद मुबारक।

ये ईद है त्योहार मिलापों का अनोखा,
दूँ सब को 'नमन' आज मैं कर ईद मुबारक।

बासुदेव जी ने ईद की पारंपरिक ग़ज़ल बहुत सलीक़े के साथ कही है। पाँवों से से ले सर तक है धवल आज नज़ारा में मानों ईदगाह का दृश्य ही सामने आ गया है जहाँ श्वेत परिधान पहने रोज़ेदार रमज़ान के समापन पर नमाज़ अदा कर रहे हैं। कितनी शांति होती है इस दृश्य में। श्वेत रंग वैसे भी शांति का प्रतीक है उसमें एक प्रकार की शीतलता होती है। सब भेद भुला कर ईद मनाने की बात और ईद के त्यौहार को अमर करने की बात बहुत अच्छे ढंग से कही गई है। मकते का शेर भी अच्छा बना है सच में ये त्यौहार मिलने मिलाने का ही तो त्यौहार है। इसमें बस एक ही काम करना चाहिए कि खूब मिलना मिलाना चाहिए। सबसे हँस कर मिलना ही तो ईद है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल क्या बात वाह वाह वाह।

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महेश चन्द्र गुप्त ’ख़लिश’

कहती है ये ख़ुशियों की सहर, ईद मुबारक
है झूम उठा सारा शहर, ईद मुबारक

दो दोस्तियों का सदा पैग़ाम सभी को
मन में न रहे आज ज़हर, ईद मुबारक

दिल खोल के बाँटें सिवैयाँ, शौक अजब है
उल्फ़त की उठी दिल में लहर, ईद मुबारक

आया है हसीं वक़्त मेरे दोस्त ज़रा सुन
कुछ देर अभी और ठहर, ईद मुबारक

रंगीन नज़ारों में ख़लिश रब न भुलाना
कर लो जो इबादत दो पहर, ईद मुबारक.

खलिश जी ने छोटी लेकिन सुंदर ग़ज़ल कही है। दिल खोल के बाँटे सिवैयाँ शौक अजब है में उल्फत की दिल में उठी लहर की बात ही अलग है। सच में ये त्यौहार यही तो बताता है कि मेहमान को घर में बुला कर उसकी खातिर करो। उसका आपके घर आना आपकी बरकत में इज़ाफा होना ही है। कहते हैं खुदा आपसे खुश होता है तो आपके घर मेहमान भेजता है। और अगले शेर में प्रेम की भावना का वही चिरंतन भाव कि अभी न जाओ छोड़ कर। प्रेम में सबसे ज्यादा एक ही बात कही जाती है कुछ देर और ठहर जाओ। यही तो प्रेम है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल क्या बात है वाह वाह वाह।

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राकेश खंडेलवाल
रह रह के हुलसता है  जिगर ईद मुबारक
कहती है ये खुशियों की सहर ईद मुबारक

विस्फोट ही विस्फोट हैं हर सिम्त जहां में
रब की नसीहतों के सफे जाने कहाँ है
इस्लाम का ले नाम उठाते है जलजला
चाहे है हर एक गांव में बन जाए कर्बला
कोशिश है कि रमजान में घोल आ मोहर्रम
अब और मलाला नहीं सह पाएगी सितम
आज़िज़ हो नफ़रतों से ये कहने लगा है दिल
अब और न घुल पाये ज़हर  ईद मुबारक
कहती है ये  खुशियों की सहर ईद मुबारक

अल कायदा को आज सिखाना है कायदा
हम्मास में यदि हम नहीं तो क्या है फायदा
कश्मीर में गूंजे चलो अब मीर की गज़लें
बोको-हरम का अब कोइ भी नाम तक न ले
काबुल हो या बगदाद हो या मानचेस्टर
पेरिस मे न हो खौफ़ की ज़द मे कोइ बशर
उतरे फलक से इश्क़ में डूबी जो आ बहे
आबे हयात की हो नहर, ईद मुबारक
कहती है ये खुशियों की सुबह ईद मुबारक

राकेश जी हमेशा नए प्रयोगो के साथ मुशायरे में आते हैं इस बार भी उन्होंने नए प्रयोग किये हैं। पहला बंद गीत का उन लोगों को कठघरे में खड़ा करता है जो धर्म की आड़ में हिंसा के बीज बो रहे हैं और अपने कृत्यों से धर्म को बदनाम कर रहे हैं। हर गाँव में कर्बला बनाना चाहते हैं। तभी तो रचनाकार कहता है कि नफ़रतों से आज़िज़ आ चुकी है अब दुनिया। दूसरा बंद पहले बंदी की नकारात्मकता का हल तलाशता हुआ आता है। कश्मीर से लेकर काबुल और बगदाद हर जगह पर रचनाकार चाहता है कि फलक से उतर कर आई आबे हयात की नहर सारी दुनिया में बहे और सारी नफरतें उस नहर के प्रेम भरे पानी में बह जाएँ। सारी दुनिया खुशरंग हो जाए। बहुत ही सुंदर गीत क्या बात है वाह वाह वाह।

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तो मित्रों आप सब को ईद मुबारक। आज की चारों रचनाओं पर खुलकर दाद दीजिए। वैसे तो मुशायरे का अधिकारिक समापन हो चुका है लेकिन भभभड़ कवि का क्य है वो तो कभी भी आ सकते हैं। तब तक जय हो।

शनिवार, 1 जुलाई 2017

ईद का त्यौहार हमारे मोहल्ले में अभी भी मनाया जा रहा है आज तिलकराज कपूर जी, गिरीश पंकज जी और डॉ. सुधीर त्यागी जी के साथ हम चलते हैं ईद की धूम में।

ईद का त्यौहार इसी सप्ताह आया और चला गया। लेकिन हम अभी भी उसके आनंद में डूबे हुए हैं। हमारे लिए तो ईद अभी भी चल रही है। हमारे मोहल्ले में ईद का त्यौहार अभी भी मनाया जा रहा है। असल में हम लोग ज़रा पुराने किस्म के लोग हैं हमारे लिए त्यौहार एक दस दिन तक चलने वाला उत्सव होता है। कम से कम दस से पन्द्रह दिनों तक नहीं मने तो वह त्यौहार ही कैसा। हम दीपावली को देव प्रबोधिनी एकादशी तक मनाते हैं, क्रिसमस को एक जनवरी तक मनाते हैं तो फिर ईद को क्यों नहीं। त्यौहार एक मनोदशा है जिसमें हम केवल आनंद ही तलाशते हैं। तो आइये आज भी हम इसी आनंद की खोज में निकलते हैं ईद के बहाने से।

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कहती है ये खुशियों की सहर ईद मुबारक

आज हम तीन शायरों के साथ तरही के क्रम को आगे बढ़ा रहे हैं। तिलकराज कपूर जी, गिरीश पंकज जी और डॉ. सुधीर त्यागी के साथ हम ईद का आनंद मना रहे हैं।

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तिलक राज कपूर

माँ तेरी दुआओं का असर "ईद मुबारक"
हैं दूर बहुत मुझसे ख़तर - ईद मुबारक

किस चाँद पे किसका है असर "ईद मुबारक"
पूछा तो ये कहती है सहर - ईद मुबारक़

अल्लाह की बंदों पे नज़र "ईद मुबारक"
आसान करे सबका सफ़र "ईद मुबारक"

दहकां तेरी मुश्किल नहीं समझेगा ज़माना
है भूख इधर और उधर "ईद मुबारक"

हर मोड़ पे कुछ प्रश्न खड़े रोक रहे थे
मुमकिन हुआ फिर भी ये सफ़र - ईद मुबारक

जो सुब्ह का भूला हुआ घर छोड़ गया था
आया है वही लौट के घर - ईद मुबारक

प्रश्नों की क़तारों में खड़ी भीड़ को देखो
मिलती है जिसे बनके सिफ़र "ईद मुबारक"

इक बार सभी दर्द भुलाकर उन्हें कहदे
"खुशियों से भरे आपका घर" - ईद मुबारक

कोशिश तो बहुत है कि कभी उनसे कहूं मैं
"हम पर हो इनायत की नज़र" - ईद मुबारक

पूरब में दिखा चाँद ये ऐलान हुआ है
जाते हैं भला आप किधर - ईद मुबारक

आग़ोश में इक ख़्वाब भरे सोच रहा हूँ
वो चांद कहे देख क़मर - ईद मुबारक

हम राह के काँटों को हटा उनसे कहेंगे
अब तुमको मुबारक हो डगर - ईद मुबारक

तन्हाई में डूबे हुए इंसा के लिए है
बीते हुए लम्हों का सफ़र "ईद मुबारक"

तिलक जी हर बार अपने शेरों से महफिल में चार चाँद लगा देते हैं। इस बार भी उन्होंने मतले में ही माँ की दुआओं के साथ शुरूआत की है। सच में माँ की दुआएँ साथ हों तो हर दुख हर गम दूर ही रहता है। जो सुब्ह का भूला हुआ घर छोड़ गया था में मिसरा सानी बहुत उम्दा बना है किसी के लौट के घर आ जाने पर सबकी ईद हो जाती है। किसी से बिछड़ कर भला कैसे ईद मन सकती है। और अगले शेर में प्रश्नों की कतारों में खड़ी भीड़ जिसे सिफर बन कर ईद मिल रही है उसका दर्द भी बहुत अच्छे से अभिव्यक्त हुआ है। बहुत खूब। अगले दोनों शेरों में दो वाक्यों को बहुत खूबी के साथ मिसरे में गूँथा गया है। खुशियों से भरे आपका घर और हम पर हो इनायत की नज़र ये दोनों वाक्य बहुत ही सुंदरता के साथ मिसरे में गूँथे गए हैं। बहुत ही सुंदर प्रयोग। पूरब में चाँद के दिखने के साथ हुआ ऐलान बहुत खूब है। अगले दोनों शेर प्रेम के शेर हैं। चाँद का क़मर को देख कर ईद मुबाकर कहना, वाह और हम राह के काँटों को हटा उनसे कहेंगे बहुत ही सुंदर प्रयोग। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल क्या बात है वाह वाह वाह।

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गिरीश पंकज

खुशहाल रहे आपका दर ईद मुबारक
"कहती है ये खुशियों की सहर ईद मुबारक"

हिद्दत सही रमजान में दय्यान के लिए
महका रहा है तुमको इतर ईद मुबारक
(दय्यान - स्वर्ग का वो दरवाज़ा जो रोजेदारों के लिए खुलता है)

तुमको नहीं देखा है ज़माने से दोस्तो
इस बार तो आना मेरे घर ईद मुबारक

अल्लाह ने बख्शी है हमें एक ये नेमत
मिलजुल के ज़िन्दगी हो बसर ईद मुबारक

छोटा - बड़ा है कोई नहीं सब हैं बराबर
रमजान दे रहा है ख़बर ईद मुबारक

गिरीश पंकज जी की ग़ज़ल हर मुशायरे में सबसे पहले प्राप्त होती है और इस बार भी ऐसा ही हुआ। मतले में ही गिरह को बहुत कमाल के साथ लगाया गया है। खुशहाल रहे आपका दर और उसके बाद गिरह का मिसरा बहुत सुंदर। अगला शेर रवायती शेर का एक बहुत ही खूबसूरत उदाहरण है। ईश की इबादत और उसके बाद खुलने वाला स्वर्ग का दरवाज़ा जिसके कारण रोज़ेदार इतर से महक रहा है। बहुत सुंदर। अगला शेर गहरे ​अर्थ की बात कह रहा है। इन दिनों जो कुछ हवाओं में फैला हुआ है उसकी और इशारा कर रहा है यह शेर। और अगला शेर एक दुआ है, एक प्रार्थना है, एक सीख है जो हम सबके लिए है। अंतिम शेर में सब के बराबर होने सबके इन्सान होने और  मिल जुल कर जीने की जो बात कही गई है वो सारी दुनिया को समझने की ज़रूरत है। बहुत सुंदर ग़ज़ल क्या बात है वाह वाह वाह।

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डॉ. सुधीर त्यागी

खुशहाल हो हर एक बशर ईद मुबारक।
बख्शे खुदा रहमत की नज़र ईद मुबारक।

दुश्मन भी अगर हो तो गले उसको लगा ले।
कहती है ये खुशियों की सहर ईद मुबारक।

कुछ लोग जो भटके हुए हैं राहे नबी से।
उनको भी चलो कह दें मगर ईद मुबारक।

कल छत पे मेरी चाँद लगा आ के टहलने,
और हँस के कहा जाने जिगर ईद मुबारक।

मिलने से गले पहले ज़रा आँख मिलाओ।
कहने का ज़रा सीखो हुनर ईद मुबारक।

इस बार गले लगने में दोनों को झिझक है।
सोलहवें बरस का है असर ईद मुबारक।

मतला एक दुआ के साथ खुलता है और दुनिया के हर इन्सान के लिए खुदा से खुशियों की और रहमत की माँग करता है। सच में त्यौहार का यही तो मतलब है कि हम सब एक स्वर में सभी के लिए खुशियों की माँग करें। अगले शेर में दुश्मन को भी गले लगाकर ईद के असली संदेश प्रेम को फैलाने की बात कह कर गिरह को लगाया गया है जो बहुत सुंदर बन पड़ा है। राहे नबी से भटके हुए लोगों को भी ईद मुबारक कहना और उनको भी अमन की राह पर लाने की बात करना ही तो असली ईद है। जाने जिगर काफिया इस मिसरे पर सबसे सटीक काफिया है जिसे बहुत सुंदर तरीके से सुधीर जी ने लगाया है। चाँद का छत पर टहलना और हंस के कहना वाह क्या बात है। और अगला शेर जिसमें मिलने से पहले आँख मिलाने का हुनर सीखने की नसीहत है बहुत ही सुंदर है। अंतिम शेर हम सबके जीवन की कहानी है मानों, बचपन से लेकर किशोरावस्था तक का साथा अचानक अजनबी क्यों बना देता है सोलहवें तक आते आते, क्यों ऐसा हो जाता है। यह झिझक ही सारी कहानी कह रही है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल वाह वाह वाह।

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तो यह हैं आज की तीनों शानदार ग़ज़लें। तीनों शायरों ने कमाल के प्रयोग किये हैं। अब आपको भी टिप्प्णियों में कमाल करना है, यदि आपके पास समय हो तो। क्योंकि इन दिनों लगता है कि आपके पास बहुत व्यस्तता है। खैर मिलते हैं अगले अंक में।